Important questions for Navy SSR/AA and Mr

Important questions for class 10th

Important questions

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नीचे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न तथा उनके उत्तर दिए गए हैं। यह प्रश्न अधिकांशत competitive exams में पूछे जाते हैं। यह प्रश्न इंडियन नेवी SSR/ AA और MR के परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण है।
                         इस पोस्ट में दिए गए प्रश्न तथा उनके उत्तर कक्षा 10 के विद्यार्थियों के लिए भी अति महत्वपूर्ण है।



1.ऊष्मा तथा ताप
 ( Heat And Temperature )


ऊष्मा
  • किसी वस्तु का तापमान उसमें निहित आंतरिक ऊर्जा का परिणाम होता है। इस आंतरिक ऊर्जा को ही ऊष्मा कहते हैं। ऊष्मा का स्थानांतरण सदैव उच्च ताप वाली वस्तु से निम्न ताप वाली वस्तु की ओर होता है।
  • इसका मात्रक कैलोरी, किलोकैलोरी तथा जूल है।
  • 1 कैलोरी= 4.18 जूल -~ 4.2 जूल
ताप
  • किसी वस्तु की गर्माहट तथा ठंडक का मापन ताप कहलाता है।
  • वस्तु के ताप को मापने के लिए जो यंत्र प्रयोग किया जाता है, उसे थर्मामीटर कहते हैं। मानव शरीर का सामान्य ताप 37 डिग्री सेल्सियस या 98.4 डिग्री फॉरेनहाइट है।
  • – 40 डिग्री सेल्सियस पर ताप, सेल्सियस फॉरेनहाइट में समान होता है। पारे का हिमांक -39 डिग्री सेल्सियस होता है।तथा इससे नीचे का ताप मापने के लिए अल्कोहल युक्त थर्मामीटर का प्रयोग किया जाता है। अल्कोहल का हिमांक -115 डिग्री सेल्सियस होता है।
  • पायरोमीटर से सूर्य के ताप को मापा जाता है।
  • किसी वस्तु का ताप -273.15 डिग्री सेल्सियस से कम नहीं हो सकता है। इसे परम शून्य ताप(Absolute Zero Temperature) कहते हैं। इसे केल्विन पैमाने पर OK लिखते हैं।  इस ताप पर आणविक ऊर्जा न्यूनतम होती है।

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ऊष्मा संचरण
 ऊष्मा संचरण की मुख्यतः तीन विधियां निम्नलिखित हैं।
  •  चालन (Conducation) उस्मा संचालन की वह प्रक्रिया, जिसमें वस्तु के ऊंचेेेे ताप वाले कण  अपेक्षाकृत कम ताप वाले कण को परस्पर संपर्क से ( आणविक कंपन द्वारा )ऊष्मा देते हैं चालन कहलाताा है।
 उदाहरण– जब धात्विक छाड़ के एक सिरे को गर्म किया जाता है। तो इसका दूसरा सिरा भी गर्म हो जाता है।  एलुमिनियम, तांबा, चांदी, उस्मा के अच्छे परिचालक हैं, जब की शीशा एक बुरा परिचालक है।
संवहन (Convection) साधारणतया द्रव तथा गैस में ऊष्मा का संचरण संवहन प्रक्रम द्वारा होता है, इसमें पदार्थ को गर्म करने पर कणों के पूर्णता: स्थानांतरण से धाराएं बहती है, जिन्हें संवहन धाराएं कहते हैं।
उदाहरण– समुद्र समीर, व्यापारिक पवने, इत्यादि।
विकिरण ( Radiation ) ऊष्मा संचालन की इस विधि में किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि यह विधुत चुंबकीय प्रकृति की होती है, तथा यह ऊष्मा संचरण ठोस, द्रव, गैस के साथ-साथ निर्वात में भी संभव है।
उदाहरण— सूर्य से पृथ्वी तक उस्मा इसी विधि द्वारा आती है। इसमें उस्मा संचालन सर्वाधिक गति से होता है।

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2.प्रकाश
( Light )


  • प्रकाश ऊर्जा का वह रूप है जो हमें देखने में सहायता करता है। जब किसी वस्तु पर प्रकाश डाला जाता है, तो यह प्रकाश परिवर्तित होकर हमारी आंखों तक पहुंचता है, जिससे बस तू दिखाई देती है।
  • सूर्य का प्रकाश, पृथ्वी पर 8 मिनट 19 सेकंड में पहुंचता है।
1.प्रकाश का परावर्तन
  • प्रकाश के चिकने पृष्ठ से टकराकर वापस आने की घटना को प्रकाश का प्रवर्तन कहते हैं।
  • आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण तीनों एक ही तल में होते हैं।
  • आपतन कोण सदैव परावर्तन कोण के बराबर होता है।

अर्थात।                कोण I = कोण R

2.विसरित एवं नियमित परावर्तन ।
  • जब सभी समांतर किरणें किसी खुरदुरे या नियमित पृष्ठ से प्रवर्तित होने के पश्चात समांतर नहीं होती, तो ऐसे परिवर्तन को विसरित परावर्तन कहते हैं।
  • इसके विपरीत दर्पण, जैसे— चिकने पृष्ठ से होने वाले प्रवर्तन को नियमित परावर्तन कहते हैं। 
3. दर्पण

  • दर्पण कांच की तरह होता है, जिसकी एक सतह पर पॉलिश होती है, जब इस पर प्रकाश डाला जाता है, तो यह अधिकतम प्रकाश का प्रवर्तन कर देता है।
4. समतल दर्पण
  • यदि प्रवर्तक सतह ( जिससे प्रवर्तन होता है ) हो,  तो उसे समतल दर्पण कहते हैं।
  • प्रतिबिंब काल्पनिक वस्तु के बराबर तथा पाश्र्व उल्टा होता है।
  • यदि कोई व्यक्ति v चाल से दर्पण की ओर चलता है, तो उसे दर्पण में अपना प्रतिबिंब 2v चाल से अपनी और गति करता हुआ प्रतीत होगा।
  • समतल दर्पण में वस्तु का पूर्ण प्रतिबिंब देखने के लिए दर्पण की लंबाई, वस्तु की लंबाई से अभी होनी चाहिए
5. गोलीय दर्पण

गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते हैं।
1. अवतल दर्पण
2. उत्तल दर्पण

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  • जिस गोलीय दर्पण के प्रवर्तक सतह उभरी रहती है, उसे उत्तल दर्पण कहते हैं। उत्तल दर्पण को अपसारी ( diverging ) भी कहा जाता है। उत्तल दर्पण से बना प्रतिबिंब वस्तु से छोटा, सीधा एवं आभासी होता है, जबकि अवतल दर्पण से बना प्रतिबिंब  बड़ा व वास्तविक होताा है।
  • जिस गोलीय दर्पण के प्रवर्तक सतह धंसी रहती है, उसे अवतल दर्पण कहते हैं।  अवतल दर्पण को अभिसारी भी कहा जाता है। 
अवतल दर्पण का उपयोग
  1. आंख, नाक एवं कान के डॉक्टर द्वारा उपयोग में
  2. वाहनों के हेड लाइट, टॉर्च, सर्चलाइट में। 
उत्तल दर्पण के उपयोग
  1. गाड़ी में चालक की सीट के पीछे के दृश्य को देखने में
  2. सोडियम प्रबर्तक लैम्पों में
6.प्रकाश का अपवर्तन
  • जब प्रकाश की किरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती है, तब वह अपने मार्ग से विचलित हो जाती है, यह घटना प्रकाश का अपवर्तन कहलाती है।
  • लाल रंग का अपवर्तनांक सबसे कम तथा बैंगनी रंग का अपवर्तनांक सबसे अधिक होता है।
7.अपवर्तन के नियम या स्नेल का नियम।
अपवर्तन के 2 नियम हैं।
  1. आपतित किरण, आपतन बिंदु पर अभिलंब, व अकबर अतीत किरण तीनों एक ही तरह में होते हैं।
  2. आपतन कोण की ज्या व अपवर्तन कोण की ज्या का अनुपात किन्ही दो माध्यमों के लिए एक नियतांक होता है। जिसे दूसरे माध्यम का पहले माध्यम के सफेद अपवर्तनांक कहते हैं।
  • इस नियम को स्नेल का नियम भी कहा जाता है। तथा नियतांक को अपवर्तनांक भी कहते हैं।

8.वायुमंडलीय अपवर्तन
= पृथ्वी का वायुमंडल सभी स्थानों पर एक समान नहीं है। इसका घनत्व पृथ्वी सतह से ऊपर या नीचे जाने पर परिवर्तित होता रहता है। इसके वायुमंडल को भिन्न-भिन्न घनत्व की परतों में मान सकते हैं। इन परतो के कारण प्रकाश के अपवर्तन को वायुमंडलीय अपवर्तन कहते हैं।
        उदाहरण— तारों का टिमटिमाना, अग्रिम सूर्योदय तथा विलंबित सूर्योदय।

9.पूर्ण आंतरिक परावर्तन
= यदि प्रकाश की कोई किरण साधन माध्यम से विरल माध्यम में जा रही हो, तथा आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से अधिक हो तो ऐसी स्थिति में प्रकाश की किरण माध्यम में जाकर पुनः पूर्व माध्यम में लौट आती है। यह घटना प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहलाती है।

10.प्रकाश का विक्षेपण
= जब प्रकाश की किरण एक पतले प्रिज्म से गुजरती है, तो निर्गतृ किरण अपने मार्ग से विचलित होने के साथ-साथ सात विभिन्न रंगों में विभक्त हो जाती है, इस घटना को प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते हैं।

11. प्रकाश का प्रकीर्णन
= धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यंत सूक्ष्म कणों से युक्त माध्यम द्वारा प्रकाश का सभी दिशा में असमान रूप से प्रसारित हो जाना, प्रकाश का प्रकीर्णन कहलाता है। प्रकीर्णन तरंग धैर्य पर निर्भर करता है।
                       
    बैगनी रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक व रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है।

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12. विवर्तन
= जब प्रकाश तरंगे छोटे छिद्र या अवरोध के तीक्ष्ण किनारों पर पड़ती है, तो  अपने पथ से विचलित हो जाती है, अर्थात किनारों से मुड़ जाती है, तब यह घटना प्रकाश का विवर्तन कहलाती है।

प्रकाश के विभिन्न प्रक्रम के व्यवहारिक उदाहरण
  • हम दर्पण में अपने आप को देख पाते हैं, क्योंकि दर्पण से प्रकाश का परावर्तन होता है।
  • पृथ्वी के वायुमंडल में अपवर्तन के कारण ही हमें तारे टिमटिमाते हुए प्रतीत होते हैं।
  • द्रव में अंशत: डूबी हुई सीधी छड़ घड़ी दिखाई पड़ती है, क्योंकि यह प्रकाश के अपवर्तन का उदाहरण है।
  • जल के अंदर पड़ी हुई वस्तु वास्तविक गहराई से कुछ ऊपर दिखाई पड़ती है।
  • रेगिस्तान में मारीचिका, जल में चमकदार बुलबुले, हीरे का चमकना, इत्यादि पूर्ण आंतरिक परावर्तन पर आधारित है।
  • प्रकाशिक तंतु या ऑप्टिकल फाइबर                                                      ( जो पूर्ण आंतरिक परावर्तन पर आधारित है ) का उपयोग डॉक्टरों द्वारा एंडोस्कोपी में किया जाता है।
  • खतरे के निशान लाल रंग के बनाए जाते हैं, क्योंकि लाल रंग की तरंगधैर्य अधिक होती है, जिसकेेेे कारण इनका प्रकीर्णन कम होता है, एवं यह दूर तक दिखाई देता है।
  • आकाश का रंग नीला दिखाई देता है, क्योंकि नीरा रंग सबसे अधिक प्राकीणित होता है, तथा फैल जाता है।
  • वर्षा के मौसम में इंद्रधनुष दिखाई देता है, जो प्रकाश के वर्ण विक्षेपण का उदाहरण है। जिसमें प्रकाश का अपवर्तन एवं पूर्ण आंतरिक परावर्ततन की घटनाएं शामिल होती है।
  • गर्मियों में सफेद वस्त्रों का उपयोग अधिक किया जाता है,  क्योंकि सफेद वस्त्र उस्मा के अच्छे प्रवर्तक व काले वस्त्र अच्छे अवशोषक होते हैं।
13. वस्तुओं का रंग
  • सामान्य प्रकाश में रखी गई वस्तु जिस रंग के प्रकाश को प्रवर्तन या अपवर्तन द्वारा हमारे आंखों में भेजती है,वस्तु उसी रंग की दिखाई पड़ती है।
  • जब श्याम पट्ट पर श्वेत प्रकाश डाला जाता है तो यह काले रंग का दिखाई देता है, क्योंकि यह प्रत्येक ( सभी ) रंग को अवशोषित कर लेता है।
14. लेंस
= लेंस दो प्रकार के होते हैं।
  1. उत्तल लेंस
  2. अवतल लेंस
  • दोनों ओर से उभरी हुई सतहों से घिरे माध्यम को उत्तल लेंस कहते हैं। इसका मध्य भाग मोटा एवं किनारे पतले होते हैं।
  • दोनों ओर से दबी हुई सतहों से गिरे माध्यम को अवतल लेंस कहते हैं। इसका मध्य भाग पतला एवं किनारे मोटा होता है।
  • जब लेंस अधिक अपवर्तनांक वाले द्रव्य में डुबाया जाता है, तो इसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है। तथा उत्तल लेंस, अवतल लेंस की भांति तथा अवतल लेंस उत्तल लेंस की भांति कार्य करता है।
  • वायु का बुलबुला द्रव में अवतल लेंस की भांति कार्य करता है।
  • लेंस की क्षमता का मात्रक डयोप्टर होता है। 

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15. मानव नेत्र एवं दृष्टि दोष
  • मानव नेत्र एक प्रकार का प्रकाशिक यंत्र है, इसका लेंस प्रोटीन से बने पारदर्शी पदार्थ का बना होता है। नेत्र में वस्तुओं के वास्तविक प्रति में रेटिना पर बनते हैं, जो कि उल्टा होती है।
  • स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी 25 सेंटीमीटर होती है।
  • निकट दृष्टि दोष में व्यक्ति पास की वस्तु को तो देख सकता है परंतु दूर की वस्तु को नहीं देख पाता है। इसे निकट दृष्टि दोष कहते हैं।
  • दूर दृष्टि दोष मैं व्यक्ति दूर की वस्तु को तो देख सकता है, परंतु निकट की वस्तु को नहीं देख पाता है। इसे दूर दृष्टि दोष कहते हैं।
  • जरा दृष्टि दोष में व्यक्ति की आयु वृद्धि के साथ नेत्र की समंजन क्षमता घट जाती है।
  • अबिन्दुकता में व्यक्ति क्षैतिज दिशा में तो ठीक देख पाता है, परंतु उर्दू दिशा में नहीं देख पाता है।

दृष्टि दोष निवारण
       दृष्टि दोष।                निवारण (लेंस)
1 निकट दृष्टि दोष अवतल लेंस
2 दूर दृष्टि दोष उत्तल लेंस
3 जरा दृष्टि दोष द्वीफोकसिय लेंस
4 अबिन्दुकता बेलनाकर लेंस
  • उत्तल लेंस की क्षमत धनात्मक तथा अवतल लेंस की क्षमत ऋण आत्मक होती है।
  • प्रकाशिक यंत्र, लेन्सो का उपयोग करके बनाया जाता है।                     उदाहरण——- फोटो कैमरा, सरल सूक्ष्मदर्शी, संयुक्त सूक्ष्मदर्शी, दूरदर्शक, आदि।
16.  प्रकाशिक यंत्र
= प्रकाशिक यंत्र एक ऐसी युक्ति है जो दर्पण, प्रिज्म , तथा लेंस के उपयोग संयोग से  बनी होती है।
17. सूक्ष्मदर्शी
= यह एक प्रकाशिक यंत्र है, जो सुक्ष्म वस्तु का बड़ा प्रतिबिंब बनाता है।, जिससे वस्तु बड़ी दिखाई देने लगती है।
18. परीदर्शी
= यह एक प्रकाशिक यंत्र है, जिसके द्वारा पेक्षक पीछे रहकर भी अपने चारों ओर के वातावरण को देख सकते हैं। इसका उपयोग पनडुब्बी, युद्धपोत, क्रूजर, आदि में किया जाता है।
19. स्पेक्ट्रोस्कोप
= यह स्पेक्ट्रम का विश्लेषण करने वाला वैज्ञानिक उपकरण है।
20. वर्णक्रममापी
= वर्णक्रम माफी का उपयोग विद्युत चुंबकीय वर्णक्रम के विशिष्ट भाग के लिए प्रकाश की विशेषताओं के मापन के लिए किया जाता है।
21. दूरदर्शी
= दूरदर्शी वह यंत्र है, जिसके द्वारा अधिक दूरी पर स्थित वस्तु का बना प्रतिबिंब आंख पर बड़ा दर्शन कोण बनाता है। तथा वस्तु आंख को बड़ी दिखाई देने लगती है।
22. खगोलीय अथवा अपवर्ती दूरदर्शी
= इसमें धातु की एक बेलनाकार नली मे दो उत्तल लेंस लगे होते हैं। इनमें एक लेंस की फोकस दूरी व द्वारक बड़ा होता है। यह वस्तु की ओर होता है। इसे अभीदृश्यक लेंस कहते हैं। दूसरे उत्तल लेंस की फोकस दूरी व द्वारक छोटा होता है। यह आंख की ओर होता है, इसे अभिनेत्र लेंस कहते हैं।

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